योगदर्शन एक समाजिक स्वरुप-
वर्तमान समय में मानसिक तनावों से जर्जर होता आज का मानव समाज हंसी-ख़ुशी, संतोष और आनन्द की तलास में इधर-उधर भटक रहा है | वह अपनी जीवन बगिया के आसपास से ईर्ष्या, निंदा, स्वार्थ , क्रोध , कटुता, घृणा आदि आधि–व्याधियों के काँटों को दूर कर देना चाहता है | वह चाहता है कि इस जीवन रूपी उद्यान में एक सुगंध आये | योग के सामाजिक दर्शन द्वारा यह संभव है | इसे भारत के एक महर्षि पतंजली ने योगदर्शन का नाम दिया है जो मनुष्य को शरीर से दृढ़ और बलवान, बुध्धि से प्रखर और पुरुषार्थी तथा भौतिक लक्षों की पूर्ति करते हुए उसे आत्मिक रूप से उत्कृष्ठ व समाजनिष्ठ बनाता है | योगदर्शन एक मानवतावादी सार्वभौम संपूर्ण जीवन दर्शन है ; भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र है |
आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा जी द्वारा सामाजिक परिप्रेक्ष्य(समाज/युग निर्माण) में 18 महत्वपूर्ण सूत्र है जिनका अभ्यास हमें करना है –
1. ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारना ।।
2. शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्म- संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे ।।
3. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे ।।
4. इंद्रिय- संयम, अर्थ- संयम, समय- संयम और विचार- संयम ।।
5. अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानना और सबके हित में अपना हित समझना ।।
6. मर्यादाओं को पालना , वर्जनाओं से बचना, नागरिक कर्तव्यों का पालन करना और समाजनिष्ठ बने रहना
7. समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानना ।।
8. चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करना ।।
9. अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करना
10. मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानना ।।
11. दूसरों के साथ वह व्यवहार न करना, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं ।।
12. नर- नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखना ।।
13. संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहना ।।
14. परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देना ।।
15. सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेना ।।
16. राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान रहना ।। जाति, लिंग, भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतना ।।
17. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस पर विश्वास करना व इस आधार पर मान्यता रखना है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे, तो युग अवश्य बदलेगा ।।
18. हम बदलेंगे- युग बदलेगा, हम सुधरेंगे- युग सुधरेगा इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास करना ।।
-प्रेरणा: आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा जी
-‪#‎vedprakashthawait‬
-अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस विशेष (21 जून 2015)