योग व व्यवहारिक उद्देश्य-
* योग समग्र रूप से जीवन जीने की कला है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनेबअन्तर्निहित शक्तियों/ऊर्जाओं का सदुपयोग कर जीवन को उत्कर्ष की ओर ले जाता है।
* योग मात्र करने का नाम नहीं होने का नाम है अर्थान् अपने मौलिकता में स्थित होना या मूल स्वभाव में स्थित होने का नाम योग है। आसान करना तो मात्र एक शारीरिक हिस्सा है जो की सहज रूप से अनिवार्य भी है। योग से समग्र व्यक्तित्व का विकास होता है(शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आध्यात्मिक स्तर पर)।
* योग का अभ्यास और अनुप्रयोग एक प्रकार से किसी संस्कृति, राष्ट्रीयता, जाति, संप्रदाय, लिंग, उम्र और शारीरिक अवस्था से परे, सार्वभौमिक है।
* अपनी चेतना को परिष्कृत कर चेतना के उच्चतर स्तरों का अनुभव करना योग की पराकाष्ठा को दर्शाता है जो मात्र अभ्यास द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है।
* समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदार व बहादुरी को जीवन में धारण करने की शिक्षा योग हमें देती है।
* अपनी दिनचर्या में सद् व्यवहार , सद्चिन्तन व स्वाध्याय को शामिल करना एवम् चिंतन, चरित्र व व्यवहार को परिष्कृत कर मानवता को विकसित करना योग का व्यवहारिक उद्देश्य है।
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प्रेरणा- आचार्य पं.श्रीराम शर्मा जी।
-अन्तराष्ट्रीय योग दिवस विशेष(21जून 2015)