योग व शारीरिक उद्देश्य -
* व्यवहारिक तौर पर आसन से पहले यम- नियम आते है। जिसमें शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्राणिधान (नियम)और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रम्हचर्य, अपरिग्रह (यम) एक व्यवहारिक उद्देश्य ही है।
* शारीरिक परिप्रेक्ष्य में योग का तात्पर्य शारीरिक अभ्यास द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य से है। अर्थात योग के ऐसे माध्यमों का उपयोग करना जो हमें सीधे शारीरिक लाभ से जोड़ती है शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाती है, मुख्य तौर पर शारीरिक अभ्यासों में आसनों के अभ्यास पर जोर दिया जाता है परंतु साथ ही प्राणायाम, ध्यान व प्रत्याहार का अभ्यास भी हमारे शारीरिक स्वाथ्य पर अत्यंत प्रभावकारी है।
* सामान्यतः सम्पूर्ण सूक्ष्म व्यायाम के साथ-साथ कुछ आसनों का अभ्यास शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने में बहुत लाभदायक होता है। इतना ही नहीं इसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है।
* महर्षि पतंजलि ने परिभाषा दी है- स्थिरं सुखम् आसनं।
(स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया)
* आसनों की श्रृंखला में बहुत से आसन है उनमें से यदि बात करें तो आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा जी द्वारा दिया गया प्रज्ञा योग 16 आसनों का एक समूह है जो कि अभ्यास के परिप्रेक्ष्य से सरल व सहज है। इसका अभ्यास करने के लिए आप इस लिंक द्वारा Video देख सकते है।

(link is external)
* इन आसनों के अभ्यास के साथ-साथ प्रज्ञा योग के अंतिम में ॐ के उच्चारण द्वारा समस्त ब्रम्हाण्डीय ऊर्जाओं को अपने अन्तर्निहित होने का अनुभव करते है।
* आसन अभ्यास में आत्मसंयम और नियमितता का होना भी जरुरी है।
* निष्कर्षतः योग के शारीरिक अभ्यास का उद्देश्य यह है कि हम अपने शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे। जिस प्रकार मंदिर जाने के लिए हम मन के साथ साथ शारीरिक स्वच्छता देखते है उसी प्रकार यहां शरीर को ही मंदिर मान कर उसकी देखभाल करनी है।
* यही वास्तव में शारीरिक उपासना है साधना है और इसका अगला पहलु आराधना है जो शारीरिक रूप से साधना के बाद उससे अर्जित ऊर्जा को सेवा के रूप में जनकल्याण हेतु लगाकर आत्मीयता का विस्तार करना है।
- ‪#‎vedprakashthawait‬
प्रेरणा- आचर्य पंडित श्रीराम शर्मा
- अन्तराष्ट्रीय योग दिवस विशेष(21 जून 2015)