लार्इलाज बीमारी सहजयोग से ठीक हो सकती है---परमपूज्‍य माताजी श्रीनिर्मलादेवी सहजयोग संस्‍थापिका

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RajendraRinwa posted this 12 June 2015 - Last edited 16 June 2015

लार्इलाज बीमारी सहजयोग से ठीक हो सकती है
चिकित्सा अधिकारियो के सम्मुख सहजयोग की संस्थापिका
परमपूज्य माताजी श्रीनिर्मलादेवी का प्रवचन

पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति की मुख्य कमी है कि चिकित्सा विज्ञान मानव को व्यक्तिगत रूप से मानता है, पूर्ण से (विराट से) जुड़ा हुआ नहीं। आप सभी विराट से जुड़े हुए हैं परन्तु लोगों को किस प्रकार विश्वस्त किया जाये कि आप सब पूर्ण से जुड़े हुए हो केवल व्यक्ति (अकेले) नही हो। क्योंकि हम सब पूर्ण से जुड़े हुए हैं हमारी सभी समस्याएं भी सबसे जुड़ी हुर्इ है। किसी व्यक्ति को आप एक चीज का रोगी और दूसरे को दूसरी का नही मान सकते। हो सकता है कि जिस व्यक्ति में एक समस्या है उसमें कुछ अन्य समस्याएं भी हों बहुत सारी अन्य समस्याएं भी जुड़ी हुर्इ हों जिन्हे आप पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान से खोज न सकें। उदाहरण के रूप में किसी व्यक्ति को आप शारीरिक रूप से बहुत बीमार देखते हैं नि:सन्देह परन्तु आप ये नही जानते कि उसे क्या होने वाला है। बिल्कुल भी नही जानते कि वह आपके सम्मुख क्या समस्याएं लाने वाला है। क्या वह मानसिक रूप से ठीक है या बीमार है? क्योंकि उसमें कुछ कमी तो है। अब हम कर्इ चीजों के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं परन्तु चिकित्सा विज्ञान में उसका कोर्इ इलाज नही है और आप कहते हैं कि यह मनौदैहिक समस्या है या ये दैहिक समस्या है। इन दोनों में क्या सम्बन्ध है ये बात हम नही जानते। आप हैरान होंगे कि कैंसर जैसी हमारी बहुत सी बीमारियां मनोदैहिक समस्याओं के कारण आती है जो लार्इलाज है। विशेष रूप से केंसर या हम कह सकते हैं कि एड्स। ऐसे सभी रोग जिन्हे हम पूर्णत: लार्इलाज और कठिन मानते हैं ये हमारे बार्इ ओर के सम्बन्धों के कारण आती है जिनके बारे में हम विश्वस्त भी नही होते।

चिकित्सा विज्ञान को केवल दांर्इ ओर का ज्ञान है। इसका यह ज्ञान बहुत विस्तृत है, यह सूक्ष्म नही है। मानव की बांर्इ ओर को समझने की यह कोर्इ आवश्यकता नही समझता और यही कारण है कि बार्इ ओर का ज्ञान चिकित्सा शास्त्रियों को नही है। उदाहरण के रूप में एक व्यक्ति जो पागल है जिसे पागलखाने भेज दिया गया है उसे ह्दय रोग हो सकता है क्यों ? किस प्रकार वह पागल हुआ। दूसरी ओर से उसका क्या सम्बन्ध है ? उदाहरण के रूप में एक रोगी केंसर पीड़ित है। केंसर के विषय में हम बहुत कुछ जानते हैं इसमें कोर्इ सन्देह नही कि किस प्रकार इसके विषाणु फैलने लगते हैं आदि-आदि। हम सभी कुछ जानते हैं। परन्तु केंसर किस कारण से होता है इस बात को कोर्इ नही जानता और ये बात भी कोर्इ नही जानता है कि कैसे लोगों को केंसर होता है।

मानव के सूक्ष्म तंत्र (नर्वस सिस्टम) के अनुसार हमारे अन्दर दो मुख्य नाड़ियां हैं। एक हमारी दांर्इ ओर की देखभाल करती है और दूसरी बांर्इ ओर की। बांर्इ ओर यदि कोर्इ समस्या है तो यह मनोदैहिक हो सकती है। मान लो आपका हाथ टूट गया है या आपके साथ कोर्इ और शारीरिक समस्या है वहां तक तो ठीक है। परन्तु यदि कोर्इ जटिल मनोदैहिक रोग है तो चिकित्सक इसका र्इलाज नही कर सकते। खेद के साथ मुझे कहना पड़ रहा है क्योंकि चिकित्सकों को इस पक्ष का ज्ञान नही है। आप नही जानते कि व्यक्ति को केंसर का रोगी बनने के लिये क्या चीज प्रभावित कर रही है। आपको जानकर हर्ष होगा कि सहजयोग में केंसर का इलाज हो सकता है यदि ये आरम्भिक अवस्था में हो तो इसका इलाज बहुत आसान है। अन्यथा भी यह ठीक हो सकता है विशेष रूप से रक्त केंसर पूरी तरह से ठीक हो सकता है। आप हैरान होंगे कि ये हमारे जीवन के इन दो पहलुओं का ऐसा सम्मिश्रण है कि हम लार्इलाज रोगों में फंस जाते हैं। लार्इलाज रोगों की बहुत बड़ी सूची है जिसे मैं बताना नही चाहती, क्योंकि आप इसके बारे में अच्छी तरह जानते हैं। परन्तु इस प्रकार के अधिकतर रोगों में बांर्इ ओर की जटिलता होती है। नि:सन्देह आप दांर्इ ओर के बारे में भली-भांति जानते हैं अब शरीर रचना उसकी चीर-फाड़ और उसके बाद की चीजों को भी जानते हैं। ये सब आप जानते हैं परन्तु आपको इस बात का ज्ञान नही है कि बांर्इ ओर आपको किस प्रकार प्रभावित करती है।

अत: इस भाषण में मैं आपको बांर्इ ओर के विषय में बताना चाहूंगी जिसके बारे में आपने कभी नही सुना और जिसके विषय में आप विश्वास भी नही करेंगे। बांया पक्ष हमारे भूतकाल का क्षेत्र है और जो लोग भविष्यवादी हैं वो भूत काल तथा बांए अनुकम्पी से अधिक प्रभावित नही होते परन्तु जो लोग बांर्इ ओर (भूतकाल) में रहते हैं उसकी चिन्ता करते हैं अपने बीते हुए समय के विषय में जिन्हे खेद है, ऐसे सभी लोग इससे प्रभावित होते हैं। बांर्इ ओर के लोगों के विषय में यदि मैं आपसे बताऊंगी तो आपको सदमा पहुंचेगा। क्योंकि वास्तव में वे भूत-बाधित होते हैं। किसी मृत आत्मा की पकड़ उन पर होती है और वही मृत आत्मा उन पर कार्य करती है। आपको इस पर विश्वास नही होगा परन्तु ये बात सत्य है। कोर्इ भी व्यक्ति जो उदासीन है या तामसिक स्वभाव को है उसके साथ ऐसा घटित हो सकता है। इसके अतिरिक्त भी बहुत सी चीजें हैं जैसे ये झूठे गुरू। ये गुरू क्या करते हैं? ये व्यक्ति को सम्मोहित कर लेते हैं। मनुष्य का ये पक्ष चिकित्सा विज्ञान का क्षेत्र नही है। ये चिकित्सा विज्ञान से परे है। फिर भी चिकित्सकों को इसका ज्ञान होना चाहिये, अन्यथा आप इन लोगों को ठीक न कर पायेंगे। हो सकता है आप रोग निदान कर लें परन्तु मनौदैहिक रोगों के शिकार ऐसे रोगियों का इलाज आप न कर पायेंगे।

आज की चिकित्सा समस्या ये है कि चिकित्सक मनौदैहिक रोगों का इलाज नही कर सकते। इसके लिये आपको आपनी एम.बी.बी.एस. की उपाधि की तरह से बहुत से वर्ष खर्च नही करने पड़ेंगे। यह अत्यन्त तीव्रता से होने वाला प्रशिक्षण है बशर्त है कि आप इसे करें। परन्तु इसमें पारंगत होने के लिये सर्वप्रथम आपको परमेश्वरी शक्ति से एकरूप होना पड़ेगा। ये कार्य बिल्कुल भी कठिन नही है। परन्तु प्राप्त करने के पश्चात् आपको अपनी आध्यात्मिक योग्यता बनाए रखनी होगी। अबोधिता प्रथम आध्यात्मिक योग्यता है। पहला चक्र जो आप महसूस करते हैं वह पावनता का है। आप यदि पावन हैं तो आप सुगमता से ऐसे रोगियों को ठीक कर सकते हैं जो इस प्रकार की लाइलाज बीमारियों से पीड़ित है। मैं कहती हूं कि व्यक्ति को सर्वप्रथम आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। इस स्थिति में जब कुण्डलिनी उठती है तो यह आपके तालूरन्ध का भेदन करती है और आप सर्वव्यापी परमेश्वरी शक्ति से जुड़ जाते हैं। चाहे आप मुझ पर विश्वास न करें परन्तु अपना आत्म साक्षात्कार पा लें। आपने यदि आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर लिया तो इस बात को समझ सकेंगे कि आपके रोगियों में किन चीजों का सम्मिश्रण है। क्या उसका रोग केवल शारीरिक है या उसमें बांर्इ ओर का सम्मिश्रण भी है। मैं हैरान थी कि उस दिन एक बच्चा मेरे पास आया। उसे मस्तिष्क-झिल्ली-सूजन रोग था। वह ठीक हो गया। उसके माता-पिता ये समझ भी न पाये कि कैसे वह ठीक हो गया। बच्चा जब ठीक हो गया तो मैने उससे पूछा तुम्हारा मित्र कौन है? उसने एक लड़के का नाम बताया जिसका एक गुरू भी था। मैने उसे बताया कि किस प्रकार आप हर समय उस गुरू को देखे जले जाते हैं? क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं? ऐसे बहुत से लोग हैं जो इस प्रकार के गुरूओं के चंगुल में फंस जाते हैं। आपको इस बात का ज्ञान होना चाहिये कि जब तक आप आत्म-साक्षात्कार प्राप्त नही कर लेते, आप जान ही नही सकते कि कौन सच्चा है कौन झूठा है। एक अबोध बच्चा जो मस्तिष्क झिल्ली सूजन से पीड़ित था रातों रात ठीक हो गया।

सहजयोग के महान अनुभव पर आप आश्चर्य चकित होंगे कि यह महान आश्चर्य है और यही कारण है कि लोग इसे स्वीकार नही करते। ऐसे बहुत से मामले हैं जिनके माध्यम से हमने दर्शाया है कि जिन रोगियों को लार्इलाज माना जाता था, वे भी ठीक हो गये हैं। ऐसे बहुत से मामले विशेष रूप से कैंसर जैसे गम्भीर रोगों के । चिकित्सा विज्ञान में कैंसर के साथ ऐसा ही होता रहेगा, जब तक आप लोग इसे पूरी तरह से समझ नही लेते। परन्तु सहजयोग में ऐसा नही है। एकदम से आप जान जाते हैं कि व्यक्ति भूत-बाधित है। चिकित्सा विज्ञान की दिशा ये बिल्कुल भी नही है परन्तु हमारे देश में हमने सदैव इस पर विश्वास किया है। मृत लोगों के विषय में हमारे विशेष नियम हैं कि इनके साथ किस प्रकार व्यवहार करना है? किस प्रकार प्रेत-क्षेत्र में जाना है? सारे मृत शरीरों को समझने के लिये विशेष प्रकार की सूझ-बूझ है वो किस प्रकार का आचरण करते हैं कहां रहते हैं और मैं सोचती हूं कि आपके ज्ञान का यह बहुत बड़ा भाग है। बांर्इ ओर से आने वाली अधिकतर बीमारियों का आप इलाज नही कर सकते।

मैं जानती हूं कि चिकित्सा विज्ञान दांर्इ ओर को ठीक कर सकता है परन्तु केंसर को वो टालते चले जाते हैं। कभी एक जगह की शल्य चिकित्सा करते हैं कभी दसरी जगह को चीरते-फाड़ते चले जाते हैं। परेशान हो जाते हैं। ये करते हैं वो करते हैं। शल्य चिकित्सा केंसर को ठीक करने का कोर्इ तरीका नही है। ये इसका उपाय नही है। आप यदि सहजयोग में कुशल हैं तो आपको इसका आपरेशन नही करना पड़ेगा। रातोंरात आप इसको ठीक कर सकते हैं। रातोंरात आसानी से केंसर के रोगी को ठीक कर सकते हैं। ऐसा करने में वे सामथ्र्य हैं विशेष रूप से भारतीय लोग क्योंकि भारतीयों में इसकी विशेष योग्यता है। मैें कहना चाहूंगी कि उनपर यह विशेष आशीर्वाद है। आप नही जानते ये देश कितना महान है। आप केवल पाश्चात्य शिक्षा के आधार पर कार्य कर रहे हैें। पाश्चात्य लोग अपने अनुभवों में कहां पहुंचे ? वे इस बात को नही समझ पाते। उनके बच्चे नशों में फंस रहे हैं उनके परिवार टूट रहे हैं हर चीज उथल-पुथल हो रही है। ऐसा नही है कि मैं इस पाश्चात्य शिक्षा की निन्दा कर रही हूं। बिल्कुल भी नही। परन्तु ये शिक्षा पूर्ण नही है। आपको इसका दूसरा पक्ष भी जानना है अन्यथा केंसर अस्पताल न बनायें। केवल शारीरिक समस्याओं को ही देखें जिन्हे आप ठीक कर सकते हैं। परन्तु यदि आप सभी प्रकार के रोगियों को ठीक करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ का ज्ञान भी आवश्यक है। घबराने की कोर्इ बात नही परेशान होने की कोर्इ बात नही। परन्तु चिकित्सक होने के नाते आपको यह ज्ञान अवश्य होना चाहिये। मैं सोचती हूं कि अभी तक भी चिकित्सा विज्ञान अधूरा है। इसमें जो कमी है वह है बार्इ ओर के ज्ञान की जो हमारे पास है।

मान लो कोर्इ व्यक्ति हर समय रोता रहता है, उदास रहता है तो ऐसे व्यक्ति को केंसर हो सकता है। दो प्रकार के लोग हैं - एक जो दांर्इ ओर के (आक्रामक) हैं तथा दूसरे जो बांर्इ ओर के (तामसिक) हैं। मैने देखा है कि जो लोग अत्यन्त आक्रमक प्रवृत्ति हैं अत्यन्त हावी होने वाले हैं तथा लोगों पर नियंत्रण करने वाले हैं उनके जिगर बहुत खराब होते हैं। मैं अवश्य कहूंगी कि उनके जिगर बहुत खराब होते हैं। जब वो बहुत आक्रामक होते हैं तो सारी सीमायें पार कर जाते हैं और इस स्थिति में जो पहली बीमारी उन्हे होती है उसे न तो आप खोज सकते हैं न ठीक कर सकते हैं। इसमें एक जिगर रोग है। मेरे विचार से डाक्टर जिगर ठीक नही कर सकते। इसके लिये वे प्रयत्न कर सकते हैं परन्तु जिगर को वैसे नही ठीक कर सकते जैसे सहजयोगी कर सकते हैं। किसी व्यक्ति का स्वभाव यदि गर्म है तथा वह आक्रामक है तो वह भयानक जिगर रोग का शिकार हो जाता है और सभी प्रकार की जटिलताएं बना लेता है। दांयी ओर के और भी बहुत से रोग हैं बहुत से परन्तु उनमें से मुख्य जिगर रोग ही है। जिगर अर्थात् जीवन का आधार आपका जिगर ही यदि खराब है तो अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के पास कोर्इ इलाज नही। हो सकता है थोड़ा बहुत कुछ हो जाय परन्तु रोग बढ़ जाने की स्थिति में व्यक्ति मूर्छित हो सकता है उसकी मृत्यू हो सकती है। पश्चिम में जिगर रोग आम बात है और उनके पास इसका कोर्इ हल भी नही है। खराब जिगर के साथ ही वे जिये चले जाते हैं डाक्टर उन्हे बस अस्पतालों में दाखिल कर लेते हैं।

ये रोग लार्इलाज नही हैं, ये पूर्णत: इलाज योग्य है। आपके पास क्योंकि ज्ञान (सहजज्ञान) नही है इसलिये आप इन्हे लार्इलाज कहते हैं। नही, ये लाइलाज नही हैं। मैं अन्य रोगों को दोष नही देना चाहती परन्तु ऐसे बहुत से रोग हैं जिनका पता भी नही लगाया जा सकता और न ही चिकित्सा विज्ञान द्वारा इनका इलाज हो सकता है। यह बात आपको स्वीकार करनी होगी कि स्थिति ऐसी ही हो। जो चाहे प्रयत्य आप करते रहें परन्तु आप इन्हे ठीक नही कर सकते। जितनी चाहे दवार्इयां बन जाये इन्हे ठीक नही किया जा सकता। मैं आपको बताना चाह रही हूं कि बीमारियों की आधी अधूरी बातचीत होती है। उसमें भी बहुत से पहलू छोड़ दिये जाते हैं।

उदाहरण के रूप में दमा रोग को लें। डाक्टर दमा रोग को ठीक नही कर सकते। यह सच्चार्इ है। परन्तु सहजयोग इसे पूर्णत: ठीक कर सकता है। सहजयोग से हम अलर्जी के रोग भी ठीक कर सकते हैं क्योंकि समस्या की जड़ों का यदि आपको ज्ञान होगा, भेषज सम्बन्धी बातों का नही, परन्तु वास्तविक जड़ों का यदि आपको ज्ञान होगा तो आप स्थिति को सम्भाल सकते हैं और रोग ठीक कर सकते हैं। प्रस्‍तुति - राजेन्‍द्र रिणवा सदस्‍य म.प्र. सहजयोग सामूहिकता, 09826400276

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RajendraRinwa posted this 12 June 2015 - Last edited 16 June 2015

मनुष्‍य का सूक्ष्‍म तंत्र । सात चक्र एवं तीन नाडियां।

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  • TOPIC CREATED DATE : 12/06/2015 15:40:00
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